यवतमाल : आज चारो और खुदगर्जी का माहौल छाया है. हर कोई अपना-अपना सोच रहा है. अपने इर्दगिर्द कौन भूखा-प्यासा है, उसकी परवाह नही. यहा तक के बुढे माँ-बाप पर वृध्दाश्रम में रहने की नौबत आयी है. मानवी मूल्यों का स्तर बहुत नीचे गीर गया है. ऐसी निराशाजनक परिस्थितीयों में पुना के डॉ. अभिजित और डॉ. मनिषा दम्पत्तीने अपने आचरण से इसे काफी उँचा उठा दिया है. वे भुखे, नंगे और अनाथ लोगों के लिये उम्मीद की किरण बन गए है. भिखारी लोगों के लिए उभयता ने जो काम किया है, उसके कारण उन्हें लोग भिखारियों का डॉक्टर (Doctor for Beggars) नाम से जानने लगे हैं.
भिखारी से ही ली प्रेरणा : मध्यम वर्ग से आये डॉ. अभिजित ने बीएएमएस किया. शुरू के दौर में उन्हे व्यवसाय में विफलता से लढना पडा. लेकिन आज उन्हे अच्छे दिन आये थे. बडे प्रतिष्ठान में लाखों के पैकेज की नौकरी भी लगी. ऐसे में उन्हे एक दिन अपने बीते हुए दिन याद आये. उन दिनो जब वे निराशा से परेशान थे तब खडकवासला के एक बुढे भिखारी ने उनका धाडस बंधाया. पैसे की भी जब कभी तकलीफ होती तो ये बाबाजी उन्हे अपने भिक्षा पात्र में इकठ्ठा हुए पैसे भी दे दिया करते. गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए तुम काम करो, तुम्हे सफलता जरूर मिलेगी ये उनका संदेश था. इस बाबाजी की याद आते ही डॉ. अभिजित उन्हे मिलने बेचैन हो गए. वे तुरंत खडकवासला के उस मंदिर में पहुँचे जहाँ उनसे बाबाजी मिले थे. पहुँचे तो पता चला बाबाजी का निधन हो गया. डॉ. अभिजित को अतीव दु:ख हुआ और पश्चाताप भी. “मै जिनकी प्रेरणा से उठ खडा हुआ उनको अपना सारा जीवन भीख मांग कर व्यतीत करना पडा. मै उनके लिए कुछ नही कर सका. इसका तीव्र खेद हुआ और फिर अभिजितने अपनी इस गलती को सुधारने का निश्चय कर अपना उर्वरित जीवन निराश्रितों तथा भिखारियों की सेवा में लगाने का फैसला कर लिया. गलती को सुधारने का बस यही एक रास्ता था.
अपने लक्ष्य की ओर : डॉ. अभिजित ने प्रतिष्ठान से त्यागपत्र दे दिया और दवाईयोंका झोला लेकर चल पडे. भिखारियों की तलाश में दिन विशिष्ट को हर रोज मंदिर, मस्जिद और चर्च जाने लगे, जहाँ भिखारी उस दिन आनेवाले भक्तों से कुछ उनके कटोरे में भी गीर जाए इस आशा से आते थे. अभिजित उनके दु:खदर्द की पुछताछ करते और उनका इलाज करते. उनके जखमों को मरहम लगाते. यहां तक की मर्ज उनके बस का ना हो तो बडे अस्पतालों में दाखिल करवा कर इलाज भी करवाते. इस काम में उनकी पत्नी डॉ. मनीषा का भी योगदान सराहनीय रहा. वे अपने डाक्टरी व्यवसाय से जो कमाती उससे परिवार खर्च करती और शेष जो बचता वह पैसा पती को उनके सेवा कार्य के लिए दे देती. शुरू में भिखारी उनकी ओर संदेह की नजर से देखते थे. उन्हे लगता था कि ये पुलीस का खबरिया तो नही. वे जानते थे कि भीख मांगना अपराध है. डॉ. अभिजित का उनके प्रती समर्पण देखकर उनका यह संदेह दूर हुआ और वे अब उनके निकट आने लगे. अपने दु:ख-दर्द कहने लगे. दिन ब दिन भिखारियों का जमावडा बढता गया और फिर डॉ. अभिजित को मदत करने के लिये पैसा कम गीरने लगा. इसका हल निकालने के लिए डॉ. अभिजित ने सोहम ट्रस्ट का निर्माण कर लिया ताकि लोगों से भी इस काम के लिए मदत मिलती रहे. आज डॉ. अभिजित के संपर्क में 1100 भिखारी और कई जरूरमंद लोग हैं, जिनकी अपेक्षाओं को पूरा करणे की वे कौशिक कर रहे है.
क्यों चाहिये भिखारियों का डॉक्टर : डॉक्टर मरिजों की दो प्रकार से सेवा कर सकते हैं. एक तो फीस लेकर और दुसरे फीस ना लेते हुए. भिखारी तो पैसा नही दे पातें. उनके लिये फीस न लेनेवाले डॉक्टर की जरूरत होती है. डॉ. अभिजित फीस ना लेनेवाले डॉक्टर बन गए. भिखारियों की प्रमुख समस्या उनकी पराधिनता है, जिसकी वजह से समाज उन्हे नही अपनाता. इसे डॉ. अभिजित भली-भांती समज गए और वे उन्हे आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाये इसका उपाय ढुंढने लगे. भिखारीयों के परिवार से 52 लडृके लडकियों को गोद लिया. और उनकी शिक्षा का प्रबंध किया गया. उनमें से कुछ अफसर बन गये. एक लडकी तो युपीएससी की तैयारी कर रही है. प्रशिक्षण केंद्र का निर्माणा भी किया गया.
मध्यरात्री का सूर्य : भिखारियों को आत्मनिर्भर करने हेतू प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया गया. इस केंद्र के लिए आवश्यक जगह की पूर्तता दानिश शहा नाम के दानी व्यक्तीने पुणे के बिबवेवाडी बस्तीमे 2500 चौ. फिट जगह और प्रशिक्षण के लिए जरूरी सामान भी उपलब्ध करा दिया. 50 से अधिक कर्मियो को नियुक्त किया गया. उनके मार्गदर्शन में ये लोग अपनी अपनी क्षमताओं के अनुसार अलग-अलग कौशल हासील कर रहे है. मंदिरो से निर्माल्य इकठ्ठा करना, उसे सुखाकर पावडर बनाना और दवाईयो का निर्माणा करना, सुंदर गुलदस्ते, सजावटी सामान बनाना, जुने-पुराने कपडों से बैग बनाना, आदि कामकाज ये लागे करने लगे हैं. कुछ लोगों ने चाय की दुकान, पूजा का सामान बेचना, हेअर पार्लर जैसे धंदे भी लगवाये. आहिस्ता आहिस्ता वे आत्मनिर्भरता की ओर बढ रहे हैं. डॉ. अभिजित की यह बडी उपलब्धी मानी जा रही है. उन्हे अबतक 2500 से अधिक पुरस्कार मिले हैं तथा शासनव्दारा सम्मानित भी किया गया है.
सेवाही ईश्वर है : डॉ. अभिजित की ईश्वर संबंधी संकल्पना बहुत ही यथार्थ है. उनके लिए भिखारी, पीडित लोगही ईश्वर है ओर उनकी सेवा ही पूजा है. वे जब भिखारियें को नहलाते है तो उनके लिये वहअभिषेक समान है. अतएवं उन्हे मंदिर जाने की आवश्यकता नही है. वेद जानने से भी किसी की वेदना जानना इसे वे अधिक महत्वपूर्ण समजते है. इस सेवा कार्य में जो सफलता मिली है इसका श्रेय वे उन लोगों को देते है जिन्होंने इसमें उनकी सहायता की है. इस सेवा यज्ञ में उनकी तमाम उपलब्धियों का श्रेय समाज के साथ-साथ वे अपनी पत्नी डॉ. मनीषा को भी देते है. डॉ. मनीषा ने घर का बोझ उठाकर उनकी सहायता की है. डॉ. अभिजित ने हम सब से अपील की है कि, “हम भिखारियों को भीख ना दे, यदि कुछ देना हो तो मदद का हाथ दे ताकि वे उठकर खडें हो सके. उनका आत्मनिर्भर होना डॉ. अभिजित का अंतिम सपना है. यह लोंग जब आत्मनिर्भर होंगे तब ही मुझे सही पुरस्कार मिला है.” ऐसा वे मानते है.
डॉ. अभिजित की उपलब्धीयां संक्षेप में :-
१. २८५ भिखारियों को निजी रोजगार.
२. ५२ बच्चों को गोद में लेकर उन्हे शिक्षित करना.
३. २५०० नेत्र शस्त्रक्रिया करवाना.
४. ३० को श्रवणयंत्र वितरण
५. १४४ मरिजों की मेजर शस्त्रक्रिया करवाना.
६. १०० लोगों का गुट बनाकर पुणे शहर में सफाई करवाना उनको ट्रस्टव्दारा वेतन देना.
७. २५०० पुरस्कार प्राप्त जिनमें लोकमान्य तिलक, गाडगे बाबा, मदर तेरेसा जैसे पुरस्कार भी शामील है.
सूचना : योगदान देना आदि जानकरी के लिए लेखक के मोबाईल पर संपर्क किया जा सकाता है.
लेखन : रणजित चंदेल, यवतमाल
(मो.नं. 9422866931 )


